Thursday, April 19, 2007

अस्सी के काशी

कल भुवनेश ने काशीनाथ सिंह की किताब 'काशी का अस्सी' के बारे में लिखा. कुछ अर्सा पहले हंस में नए लेखन के बारे में काशीनाथ सिंह ने एक लेख लिखा था. उसके कुछ अंश नीचे हैं.

मेरा अनुभव बताता है कि कहानी यथार्थ का भाषिक अनुवाद नहीं है। यदि कहानी का यथार्थ वस्तु-जगत का हू-ब-हू यथार्थ हो तो वह कहानी एकरस, उबाऊ और निर्जीव हुआ करती है। कहानी को यदि जीवित और आकर्षक बनाए रखना है तो यथार्थ से मुक्ति हमारी रचनात्मक आवश्यकता है। हम अपने पंख फैलाना चाहते हैं, उड़ना चाहते हैं लेकिन हमारे पैरों में पत्थर की तरह यथार्थ बंधा है। कभी-कभी हम अपने हाथ-पांव फेंकने को ही उड़ना समझ बैठते हैं। लेकिन यह हम समझते हैं, पाठक नहीं। लिहाजा, हम यह मानकर चलें कि यथार्थ कहानी नहीं होता, कहानी में `यथार्थ' होता है। यथार्थ में छेड़छाड़ के बिना गद्य तो संभव है, गल्प नहीं।

गल्प के रुचिकर होने को वे उसकी पहली आवश्यकता मानते हैं. ख़ासकर आप अगर केवल दूसरे लेखकों के लिए नहीं बल्कि पाठकों के लिए लिखते हों. कहते हैं.
...यदि हम लेखक हैं और साहित्य में ही जीने-मरने के लिए अभिशप्त हैं तो बात दूसरी है लेकिन यदि हम पाठक हैं तो आपकी या किसी की कहानी को पढ़ना हमारी मज़बूरी नहीं है।

और जो पंक्तियाँ मुझे सबसे प्रभावी लगीं
जब भी विचारों की लड़ाई रचना के माध्यम से सचेत होकर लड़ी जाती है तो लड़ाई का चाहे जो होता हो, रचनात्मकता का क्षरण ही होता है।

Wednesday, April 11, 2007

अपनी भाषा में मैं स्मार्ट हूँ

प्रवासियों के सबसे बड़े दर्दों में भाषा का दर्द होता है. पर भारतीय आप्रवासियों द्बारा ये बात उतनी मुखरता से नहीं उठती नज़र आती, कम से कम सामूहिक मंचों पर. कारण हमारी ख़ुशफ़हमी हो या हीनताबोध या फिर देश से साथ ढोकर लाया हुआ अंग्रेज़ी के ऊँचे स्टेटस का ठप्पा, पर खुले तौर पर बहुत कम आधुनिक भारतीय आप्रवासी मानते हैं कि उनकी अंग्रेज़ी अच्छी नहीं.

ड्रैगन टोडोरोविक जोकि एक सर्बियाई पत्रकार हैं 1995 में युगोस्लाविया से जाकर कनाडा बस गये थे. उन्होंने हाल में एक रेडियो शो (In My Language I am Smart - The Immigrant Song) में अपने भाषा अनुभव का ज़िक्र किया. इसकी ऑडियो क्लिप उनकी साइट पर रखी है. सुनने लायक है. बड़ी सटीकता से उन्होंने इस नब्ज़ पर हाथ रखा है. अपनी साइट पर इससे जुड़े एक नोट में वे लिखते हैं (मूल अंग्रेज़ी में ही उद्धृत कर रहा हूँ, अगर किसी को अनुवाद चाहिए तो बताएँ),

I realized quickly that I had a problem. It was not so much with my vocabulary, or my spelling­—on the contrary, that part of my education was very good—but with the precise meaning and finesse of expression.
[...]
Language is acquired with its sound, and the sounds I had picked from records and movies were harsh, aggressive, and presented me in a very different light from who I was and am. Suddenly I realized that somewhere in the process of acquiring the tone of modern English I had lost my identity. It was painful to realize that in my language I was smart, but I sounded stupid in English. Example: while walking with my Canadian friend one day by a church, he started talking about the architecture of that particular building, and while I wanted to say a few things about how I liked the Gothic details on the arch at the entrance, and how I admired the intelligent choice of stones, all I could squeeze out was, “Yeah, it’s cool”.

Acquired meaning is superficial. Sound puts word into context, but the deeper shades of expression are not learned. I responded the way that Clint Eastwood, or some other action hero, would in one of their roles. Back in Serbian language I was connoisseur of arts; in my newly acquired language I was a cop.
[...]
The process of learning a new language is not rounded and simple: at first, it is not the language as a whole that is acquired, but a series of foreign words is superimposed onto mother's tongue. Unavoidably, one has to go through a mutation that is both painful and funny. This piece is an exploration of the immigrant's experience.

वे पूछते हैं,
Where do I belong after going through this experience?

भारतीयों की सोचें तो ये सवाल केवल आप्रवासियों का नहीं है. लगभग सभी अंग्रेज़ी-शिक्षित भारतीय अंग्रेज़ी में बोलकर अपनी बात भली-भाँति और सटीकता से समझा पाने के मामले में अक्षम हैं. और अगर बात किसी गम्भीर विषय पर हो तो पूछिये मत. आप्रवासियों की तो ख़ैर मज़बूरी है. देशवासियों के पास क्या जवाब है?

[लैंग्वेजहैट के जरिये]

Monday, April 09, 2007

क्या सौन्दर्यबोध परिस्थिति से प्रभावित होता है?

धूप में निकलो घटाओं में नहाकर देखो
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटाकर देखो
- निदा फ़ाज़ली
वाशिंगटन पोस्ट ने जानना चाहा,
सुंदरता क्या है? ऐसा कुछ जिसे मापा जा सके (बकौल गॉट्फ़्राइड लेबनीज़), या केवल एक राय (बकौल डेविड ह्यूम), या फिर जैसा इमैन्युएल कांट ने कहा था कि थोड़ी थोड़ी दोनों, पर उसपर दर्शक की तात्कालिक मानसिक अवस्था का भी प्रभाव होता है?
इस सवाल का बेहतर जवाब जानने के लिए पोस्ट ने एक मज़ेदार प्रयोग किया.

वाशिंगटन के व्यस्ततम मेट्रो स्टेशनों में से एक है ल'फ़ाँत प्लाज़ा. यहाँ अक्सर सुबह के व्यस्त घंटों के दौरान स्थानीय संगीतवादक वायलिन, गिटार या पियानो बजाते सुनाई दे जाते हैं. गुज़रने वाले अपनी इच्छानुसार डॉलर या चिल्लर इनकी खुली पेटी में छोड़ जाते हैं.

वाशिंगटन पोस्ट ने वहाँ बिठाया (बल्कि खड़ा किया) जोशुआ बेल को. जोशुआ दुनिया भर में ख्यातिप्राप्त वायलिन वादकों में से हैं. इस प्रयोग से तीन दिन पहले ही उन्होंने बोस्टन के सिम्फ़नी हॉल में वायलिनवादन किया था और वहाँ ठीक-ठाक सीटें भी 100 डॉलर में बिकी थीं. पोस्ट ने उनसे स्टेशन के बाहर वायलिन बजाने का आग्रह किया. ठीक उसी तरह जैसे आम स्थानीय कलाकार खड़े होकर बजाते हैं - अकेले, बिना किसी ताम-झाम के, पैसों के लिए पेटी खुली रखकर.

देखना यह था कि क्या एक विश्व-स्तरीय कलाकार, अद्भुत संगीत, और एक उत्तम वाद्य-यन्त्र का मिश्रण एक आम, काम पर जा रहे कम्यूटर के सौन्दर्यबोध को प्रभावित करेगा. क्या एक साधारण माहौल और असुविधाजनक समय में सौंदर्य बरक़रार रहेगा?

क्या हुआ यह विस्तार से जानने के लिए वाशिंगटन पोस्ट का आलेख पढ़िये. घटना की विडियो रिकॉर्डिंग भी वहीं उपलब्ध है.

Thursday, April 05, 2007

देसीपंडित सर्वेक्षण


आपमें से कुछ को शायद पता हो कि देसीपंडित ने हाल ही में एक पाठक सर्वेक्षण करवाया था. पैट्रिक्स ने आज उसके परिणामों का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है.

सर्वेक्षण का एक प्रश्न जो हिंदी से संबन्धित था, उसमें पूछा गया था कि आप कितनी बार देसीपंडित का हिंदी अनुभाग देखते हैं? इसके जवाब में 73% लोगों का कहना था 'कभी नहीं'. ज़ाहिर सी बात है. आख़िर मुख्यतः अंग्रेज़ी की साइट है. पहले पन्ने पर सिर्फ़ अंग्रेज़ी के ब्लॉग ही आते हैं. अंग्रेज़ी में कुल ब्लॉगों की संख्या भी ज़्यादा है, देसीपंडित पर ब्लॉग कवर करने वालों की भी, और वहाँ चर्चित ब्लॉगों की भी. फिर उसमें बाकी भाषाओं के पाठक मिला लें तो 73% कुछ निराशाजनक नहीं लगता.

उल्टे मुझे ये जानकर आश्चर्य-मिश्रित ख़ुशी हुई कि देसीपंडित को पढ़ने वालों में से 27% ऐसे हैं जिन्होने कभी न कभी हिंदी अनुभाग देखा है. इनमें से 9% इसे कभी-कभी देख लेते हैं और 3% अक्सर पढ़ते हैं.

तो चलिए एक तुरत-फ़ुरत का उपसर्वेक्षण करते हैं - आप उन 3%(अक्सर पढ़नेवालों) में हैं, या 73% (कभी नहीं देखने वालों) में या कहीं बीच में?

Sunday, April 01, 2007

अप्रैल फूल

अप्रैल फूल यानी चेरी ब्लॉसम या सकूरा - जो साल में केवल हफ़्ते भर खिलते हैं.

Thursday, March 29, 2007

तकनीक लोगों के लिए

वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम ने 2006-07 के लिए वैश्विक सूचना तकनीक रिपोर्ट जारी कर दी है. यह रिपोर्ट विश्व के 122 देशों के लिए 'नेटवर्क तैयारी सूचकांक' (NRI) बताती है जो कि 3 घटक सूचकांकों से बना है -
1) देश या समाज द्वारा उपलब्ध कराया गया 'सूचना और संवाद तकनीक' (ICT) का माहौल
2) समाज के प्रमुख हिस्सेदारों की तैयारी (जनता, व्यापार, सरकार)
3) इन हिस्सेदारों में सूचना और संवाद तकनीक का प्रयोग

तो ख़बर यह है कि अमेरिका तकनीकी सिरमौर नहीं रहा. बल्कि आस-पास भी नहीं. पिछले साल के पहले से अब वह सीधे 7वें स्थान पर आ गया है. और अपने आप को आइटी महाशक्ति समझने वाला भारत 44वें स्थान पर है, पिछले साल से 4 स्थान नीचे.

यह रहे शीर्ष 10 देश, ख़ासकर उनके लिए जो कहते हैं अँग्रेज़ी में शिक्षा के बिना तकनीकी तरक्की संभव नहीं.

1. डेनमार्क
2. स्वीडन
3. सिंगापुर
4. फ़िनलैंड
5. स्विटज़रलैंड
6. नीदरलैंड्स
7. अमेरिका
8. आइसलैंड
9. यूके
10. नॉर्वे

भाषा के संदर्भ में ये आँकड़े अगर कुछ बताते हैं तो यह कि तकनीक को हर एक तक पहुँचाने के लिए तकनीक का स्थानीयकरण ज़रूरी है. हमारे यहाँ नीति उल्टी तरफ़ से चल रही दिखती है. हम लोगों का विदेशीकरण करने में लगे हैं.

Monday, March 26, 2007

आज मेरी क़िस्मत अच्छी है

अगर आपने गूगल का हिंदी खोजक इस्तेमाल किया हो तो आपकी नज़र उस बटन पर ज़रूर पड़ी होगी जो कहता है - 'आज मेरी क़िस्मत अच्छी है'. अगर आप कुछ लिखकर 'खोज' की बजाय यह बटन दबाते हैं तो गूगल सीधा आपको सबसे संगत परिणाम (यानि जो परिणाम पृष्ठ पर सबसे ऊपर हो) की साइट पर भेज देता है.

करीब 5-6 साल पहले जब मैंने गूगल के जुमले "I'm Feeling Lucky" का यह अनुवाद किया था तब हिंदी खोज की दुनिया बिल्कुल सुनसान थी. स्वामित्वधारी फ़ॉण्टों पर बनी कुछ हिंदी साइटें चल रही थीं और उनमें खोज पाने की तरकीब किसी के पास नहीं थी. बीबीसी हिंदी के अलावा कोई प्रमुख साइट यूनिकोड में नहीं थी. गूगल ख़ुद भी यूनिकोड समर्थन के साथ प्रयोग ही कर रहा था और नतीजतन यह अनुवाद भी मुझे रोमन लिपि (आइट्रांस) में करना पड़ा था.

तब से अब तक इंटरनेट पर हिंदी की गंगा में बहुत बाइट्स बह चुके हैं. ऐसे खोज इंजन उपलब्ध हैं जो न केवल यूनिकोड बल्कि सभी मुख्य हिंदी कूटकरणों को पहचान सकते हैं और उन्हें सूचीकृत या इंडेक्स कर सकते हैं. और सबसे बड़ी बात जिसका ज़िक्र मैंने कुछ दिन पहले किया था कि अब ढूँढ़ने को भी बहुत कुछ है.

इस समय छह ऐसी हिंदी खोज साइटें हैं जो अपना खोज इंजन (खोजक) इस्तेमाल करती हैं - गूगल, लाइव (या एमएसएन), याहू, भ्रमर, रफ़्तार, और गुरूजी. आइए इन हिंदी खोजकों द्वारा उपलब्ध कराई जा रही सुविधाओं और इनके तकनीकी परिमाणों पर एक तुरत तुलनात्मक नज़र डालें.

हिंदी टाइप सुविधा
गूगल - नहीं
लाइव - नहीं
याहू - नहीं
भ्रमर - नहीं
रफ़्तार - हाँ
गुरूजी - हाँ
-
हालाँकि धीरे धीरे यह सुविधा अप्रासंगिक होती जाएगी, इस वक़्त इसके बड़े फ़ायदे हैं. दुख की बात यह कि जहाँ यह सुविधा उपलब्ध है वहाँ भी फ़ायरफ़ॉक्स पर काम नहीं करती.

वर्तनी सुझाव
गूगल - नहीं
लाइव - नहीं
याहू - नहीं
भ्रमर - नहीं
रफ़्तार - हाँ
गुरूजी - हाँ

प्रति संचय
गूगल - हाँ
लाइव - हाँ
याहू - हाँ
भ्रमर - नहीं
रफ़्तार - हाँ
गुरूजी - हाँ

ग़ैर-यूनिकोड सूचन (इंडेक्सिंग)
गूगल - हाँ
लाइव - हाँ
याहू - हाँ
भ्रमर - नहीं
रफ़्तार - हाँ
गुरूजी - हाँ
-
भ्रमर के अलावा सभी खोजक अब अयूनिकोडित सामग्री को सूचीबद्ध करने में समर्थ हैं

हिंदी अंतरपटल
गूगल - हाँ
लाइव - हाँ
याहू - नहीं
भ्रमर - हाँ
रफ़्तार - हाँ
गुरूजी - हाँ
-
यह एक आवश्यक परिमाण है और एक तर्क हो सकता है कि याहू को इस वजह से हिंदी का खोजक माना ही न जाए.

सूचक आकार (नमूना खोजशब्द - "हिन्दी")
गूगल - 6430 हज़ार
लाइव - 356 हज़ार
याहू - 418 हज़ार
भ्रमर - 98
रफ़्तार - 96 हज़ार
गुरूजी - 62 हज़ार
-
सूचीबद्ध पन्नों की संख्या एक बहुत महत्वपूर्ण मानदंड है. यहाँ गूगल स्पष्ट रूप से बहुत आगे है. और भ्रमर लगभग इस दौड़ से बाहर ही हो गया है.

तेज़ी (नमूना खोजशब्द - "हिन्दी")
गूगल - 0.018 सेकेंड/हज़ार-शब्द
लाइव - (खोजसमय अनुपलब्ध)
याहू - 0.21 सेकेंड/हज़ार-शब्द
भ्रमर - (सूचक बहुत छोटा)
रफ़्तार - 1.875 सेकेंड/हज़ार-शब्द
गुरूजी - (खोजसमय अनुपलब्ध)
-
लाइव और गुरुजी के लिए हालाँकि खोज समय आँकड़े उपलब्ध नहीं है, पर वे काफ़ी तेज़ दिखाई देते हैं. गूगल सबसे तेज़ है और लाइव उससे बहुत पीछे नहीं.

ये कुछ महत्वपूर्ण परिमाण थे और एक सरसरी नज़र बताती है कि गूगल हिंदी खोज में भी नम्बर 1 है. पर साथ ही यह भी कि गुरुजी जैसे भारतीय खोजक उन बातों में बेहतर हैं जो एक हिन्दीभाषी के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती हैं.

पर जो बात सबसे अच्छे खोजक को बाक़ियों से अलग करेगी वह है परिणामों की संगतता. इसके लिए बड़ा सूचक (इंडेक्स) होना महत्वपूर्ण है पर उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है खोज एल्गॉरिद्म - वह फ़ॉर्मूला जो किसी परिणाम को ऊपर दिखाता है और किसी को नीचे. और किसी को सबसे ऊपर. मुझे इस समय गूगल इस मामले में सबसे आगे दिखता है, पर बेहतर होगा कि आप इसे ख़ुद मापें. तो जब जब कुछ खोजने पर आपको इच्छित परिणाम सबसे ऊपर दिखाई दे, बोलिए आज मेरी क़िस्मत अच्छी है. और आप जल्दी ही अपनी पसंद का इंजन पा जाएँगे.

Wednesday, March 21, 2007

RMIM पुरस्कार घोषित

करीब महीने भर चली नामांकन और अंकन प्रक्रिया के बाद वर्ष 2006 के RMIM पुरस्कार सामने हैं।

ओमकारा को 'साल का एल्बम' चुना गया है. विवरण और अन्य श्रेणियाँ पुरस्कार वेबसाइट पर देखे जा सकते हैं।

प्रक्रिया में हिस्सा लेने वाले वोटरों और अन्य तमाम सहयोगियों का धन्यवाद।

Wednesday, March 14, 2007

वेब पर हिंदी - एक दो तीन होने की तैयारी

वेब पर हिंदी सामग्री अब उस अवस्था में पहुँच गई है जिसे अंग्रेज़ी में 'क्रिटिकल मास' कहा जाता है. और पिछले कुछ महीने इसमें बहुत मददगार रहे हैं (यूँ वेब पर महीने सालों के बराबर होते हैं). इस अर्से में हिंदी में उपलब्ध साइटों, सुविधाओं, और जानकारी में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है. कुछ मुख्य उदाहरण देखें, जिनमें से कई तो पिछले महीने में ही जारी हुए हैं:

इनके अलावा पुराने चिट्ठों और साइटों पर भी सामग्री तेज़ी से बढ़ रही है.

यानि वह समय आ गया है जब हिंदी सामग्री बुकमार्कों से उफन कर बाहर निकल रही है और सर्च इंजनों की दरकार महसूस होने लगी है. कंटेंट निर्माण के साथ साथ विकेंद्रीकरण भी बढ़ रहा है जो कि न केवल विविधता के लिए अच्छा है बल्कि इंटरनेट के मूल चरित्र के पास भी है, और इसीलिए अवश्यंभावी भी. अच्छे खोजक इस चरित्र को विकसित करने में काफ़ी सहायक होते हैं.

यूनिकोड अब वेब पर हिंदी सामग्री के लिए वैसा ही मानक बन चुका है जैसा अंग्रेज़ी के लिए ASCII है. लगभग सभी नई साइटें इसी कूटकरण में बन रही हैं. पुरानी साइटों को इसमें बदला जा रहा है (मसलन एनआइसी की बनाई साइटें और अभिव्यक्ति-अनुभूति). और जो साइटें अपने स्वामित्वधारी फ़ॉण्ट इस्तेमाल कर रही हैं (उदा. दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर), वे भी अब बड़ी आसानी से ऑन-द-फ़्लाई (हाथों-हाथ) यूनिकोड में बदली जा सकती हैं. सर्च इंजन भी इन्हें खोज पा रहे हैं. कुल मिलाकर अब इस सिलसिले में मानक कोई बाधा नहीं रहा है.

इस अवस्था के बाद खोजकों का योगदान महत्वपूर्ण हो जाता है. ये हिंदी के प्रयोक्ता के लिए तो जीवन आसान बनाएँगे ही, इनके जरिये अपनी सामग्री तक आसान पहुँच व्यापारों, संस्थाओं, और संगठनों को भी हिंदी में साइटें बनाने के लिए प्रेरित करेंगी. जहाँ प्रयोक्ता और प्रस्तोता दोनों एक दूसरे को संपुष्ट करेंगे, खोजकों की भूमिका एक महत्वपूर्ण उत्प्रेरक की होगी. और इसीलिये अच्छे हिंदी खोजकों की ज़रूरत बहुत बढ़ जाती है.

गूगल ने अपनी हिंदी खोज में हाल में सुधार किए हैं और नया इंजन गुरूजी भी बड़ी जल्दी लोकप्रिय हो रहा है. इसके अलावा इस क्षेत्र में शुरुआती कदम उठाने वाला रफ़्तार भी लगातार दौड़ में है. ये सभी बहुत अच्छे प्रयास हैं. और हालाँकि हिंदी सर्च की एल्गॉरिद्म को अभी काफ़ी आगे जाना है, वेब पर कहीं भी उड़ने और गुम न होने की आज़ादी अब हिंदी टेक्स्ट के पास है. तो कमर कस लीजिए, यहाँ से सफ़र तेज़ होने वाला है.

Wednesday, February 21, 2007

2006 के हिंदी फ़िल्म संगीत के लिए पुरस्कार

अगर आप नए हिंदी फ़िल्म संगीत में रुचि रखते हैं तो 2006 के RMIM पुरस्कार में अपनी प्रविष्टि भेजिए. नामांकन 3 मार्च तक खुला है. आप अपने मनपसंद एलबम और गाने बिना किसी पूर्वनियोजित शॉर्टलिस्ट से बंधित हुए चुन सकते हैं.

इस पुरस्कार के बारे में अधिक जानने के लिए गीतायन ब्लॉग देखें.

Thursday, October 05, 2006

जर्मनागरी


फ़्रैंकफ़र्त में २००६ का पुस्तक मेला चल रहा है और भारत सम्माननीय अतिथि है। मेले और भारतीय साहित्यिक परिदृष्य पर हिंदी में एक वेबसाइट भी बनाई गई है। पर बात यहीं तक सीमित नहीं है। मुख्य मीडिया भी उत्साहित दिखाई देता है। जर्मन अख़बार डी टागसज़ाइटुंग ने अपने कल (४ अक्टूबर) के अंक का मुखपृष्ठ अपने नाम के नागरी रूप के साथ छापा है। देखिये जर्मन और हिंदी का मेल (पीडीएफ़ प्रारूप)।

(छवि सौजन्य: साँभर माफ़िया)

Monday, October 02, 2006

सूरत बदलनी चाहिए

पिछले हफ़्ते जब मैंने मीन-मेख अभियान शुरू करने का ज़िक्र किया था तो मुझे विशेष प्रतिक्रिया की आशा नहीं थी. पर प्रतिक्रियाएँ मिलीं और अच्छी मिलीं. लोग सकारात्मक दिखाई दिए और कइयों ने अपने चिट्ठे पर आने का न्यौता भी दिया. मैंने भी कुछ चिट्ठों पर टिप्पणियों में इस बारे में लिखना शुरू किया. इस बात का ध्यान रखा कि जिन्होंने रुचि दिखाई है, या न्यौता दिया है, वहीं जाऊँ. पर लगता है कि कुछ लोगों को बुरा लगा. जैसे समीर लाल जी को, भले ही उन्होंने यह बताने के लिए हास्य का सहारा लिया है (जोकि उनका बड़प्पन है).

पर मुद्दे पर आऊँ उससे पहले एक दो बातें और कहना चाहूँगा.

मैं निंदक नहीं हूँ. निंदक और आलोचक में भी फ़र्क होता है. और मैं तो आलोचक भी नहीं. मुझे तो ज़्यादा से ज़्यादा प्रूफ़रीडर कह सकते हैं. या थोड़ा अधिक सम्माननीय होना चाहें तो उत्प्रेरक (कुछ सीखने का) कह लें. पर निंदक? न.

मैं "व्याकरणाचार्य" भी नहीं हूँ :). अनूप जी की तो मौज लेने की आदत है. पर जो उनकी इस आदत से नावाक़िफ़ हों उनके लिए स्पष्ट कर देना ज़रूरी है. मैं भी आपमें से अधिकतर की ही तरह एक सामान्य हिंदी भाषी हूँ. न तो मैं कोई भाषाविद हूँ न भाषाविज्ञ. भाषा में रुचि रखने वाला या शिक्षार्थी हूँ. यह हिंदी का दुर्भाग्य होगा अगर किसी व्यक्ति को सिर्फ़ इस बिना पर कि वह ठीक हिंदी लिखता है, व्याकरणाचार्य या भाषाविद समझा जाए. ठीक हिंदी लिखना हर हिंदी लेखक की बुनियाद होनी चाहिए, उसकी विशेषता नहीं.

ख़ैर, अब मुद्दे पर आता हूँ. सार्वजनिक रूप से ग़लतियाँ बताना कुछ को खला है (हाँ, सार्वजनिक रूप से ग़लतियाँ *करने* में वे कोई बुराई नहीं मानते :)). खुली टिप्पणियों में सुधारों का ज़िक्र करने के पीछे मंशा यह थी कि चिट्ठा लिखनेवाले के अलावा उसे पढ़नेवाले भी फ़ायदा उठा सकेंगे. पर न तो मैं चाहता हूँ कि किसी को बुरा लगे, न ही किसी की कमियाँ दिखाना मेरा ध्येय है. दुष्यंत को उद्धृत करूँ तो:

सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

पर घबराइये मत (या अगर आप दूसरी तरफ़ हैं तो ख़ुश मत होइये :)), इतनी जल्दी मैं हार नहीं मान रहा. बस ये कुछ बदलाव तय किये हैं मैंने इस अभियान में.

॰ अब मैं सार्वजनिक रूप से उन टिप्पणियों को प्रकाशित नहीं करूँगा. अधिकतर चिट्ठों में 'टिप्पणी मध्यस्थन' सुविधा है. ऐसे चिट्ठेवालों से अनुरोध है कि मेरी टिप्पणियों में सुझाए सुधार देखें, हो सके तो प्रविष्टि की ग़लतियाँ सुधार लें और फिर मेरी पोस्ट को रद्दी की टोकरी में डाल दें. यानी उसे प्रकाशित मत करें.
॰ जिन चिट्ठों पर ऐसी सुविधा नहीं है वहाँ मैं टिप्पणियाँ नहीं छोड़ूँगा.
॰ कोशिश करूँगा कि दिवाली तक यह सफ़ाई अभियान खींच जाऊँ.
॰ कोशिश करूँगा कि दिन में कम से कम एक जगह तो झाड़ू लगा ही दूँ.
॰ कोशिश रहेगी कि जिसने रुचि दिखाई हो, पहले (या शायद सिर्फ़) वहीं जाऊँ.

आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. इससे मुझे यह भी पता चलेगा कि आपकी इस सुधार में रुचि है और आपको कोई आपत्ति नहीं है. बस, महज शिष्टाचारवश ऐसा मत करें. अब ये कहाँ का शिष्टाचार कि किसी को अपने घर के जाले निकालने बुलाओ और जब वह निकाले तो कहो कि भई सचमुच थोड़े ही बुलाया था :).

Thursday, September 28, 2006

गलत गलत अभ्यास से...

कुछ अर्सा हुआ, आलोक ने एक अभियान शुरू किया था - चिट्ठों पर वर्तनी और व्याकरण की भूलों की ओर इशारा करने का. मेरे विचार से बड़ा ही उम्दा अभियान था, और बहुत ज़रूरी. अगर हिंदी चिट्ठों की वर्तमान स्थिति का जायज़ा लिया जाए तो यह सबसे ज़्यादा चिंता का विषय है. अपनी बात कहूँ तो अगर अँगरेज़ी के किसी चिट्ठे में मुझे इस क़दर वर्तनी अशुद्धियाँ मिलें तो मैं एक पैरे से आगे न बढ़ूँ और उस चिट्ठे पर लौटूँ तक नहीं. अक्सर कई हिंदी चिट्ठों के साथ भी ऐसा करने की इच्छा होती है, और कुछ के साथ किया भी है, पर कुछ मजबूरी में और कुछ लत की वजह से चलता रहता है.

मेरी बात कइयों को बुरी लग सकती है. अगर लगे तो माफ़ी. और चाहें तो मुझे भला-बुरा भी कह लें. पर इस बारे में ज़रा सोचें. ग़लतियों से मेरा उतना झगड़ा नहीं है, जितना न सीखने की प्रवृत्ति से है, उनके दोहराव से है. भाषा केवल ख़ुद के लिए नहीं होती. जब आप दूसरों के लिए लिखते हैं तो कम से कम इसका ख़याल रखें कि लोग आपकी बात ठीक-ठीक बिना अटके, बिना झुँझलाये समझ सकें. अब यह मत कहें कि मैं तो बस अपने लिए लिखता/ती हूँ. अगर आपका ब्लॉग सार्वजनिक है, आप दूसरों की टिप्पणियाँ लेते हैं और उनका जवाब देते हैं, तो आप दूसरों से बात कर रहे हैं. अगर हर कोई हिज्जों के अपने अपने संस्करणों का प्रयोग करने लगे तो संवाद मुश्किल हो जाएगा. साहित्य और कविता के चिट्ठों में तो ऐसी ग़लतियाँ अक्षम्य हैं. इन अशुद्धियों को लेखन-शैली से मत जोड़ें. शैली व्यक्तिगत होती है, व्याकरण और वर्तनियाँ नहीं.

अक्सर कई लोगों का तर्क होता है कि आप सामग्री पढ़िये न, अशुद्धियाँ को क्यों देखते हैं; जो लिखा है वह महत्वपूर्ण है. बेशक है. वह ज़्यादा महत्वपूर्ण है. पर खाना भले कितना ही स्वादिष्ट बना हो, अगर उसमें एक भी कंकर निकल आए तो पूरा मज़ा बिगड़ जाता है. फिर यह नहीं देखा जाता कि भई स्वाद तो अच्छा है. और जब कंकरों की लाइन लगी हो फिर तो खाना छोड़ने के अलावा कोई उपाय नहीं. दुनिया भर के संपादक और लेखक अगर अपनी प्रकाशित रचनाओं में इन चीज़ों का ध्यान रखते हैं, और इस पर अच्छा खासा समय देते हैं, तो इसलिए नहीं कि वे बेवकूफ़ हैं.

अनुरोध है कि थोड़ा ध्यान दीजिए. ग़लतियाँ होना स्वाभाविक है. हममें से अधिकतर को अँगरेज़ी में पढ़ने-लिखने की आदत रही है. पर अब आप हिंदी में लिख रहे हैं तो हिंदी के प्रति कुछ सम्मान भी होना चाहिये. चलिए हिंदी के प्रति सम्मान न भी हो, अपने पाठक के प्रति तो होना ही चाहिए. लेखक अगर अपनी भाषा ही अच्छी तरह न जाने तो उसे कैसे पाठक मिलेंगे. हिंदी सीखने पर थोड़ा वक़्त देना नाजायज़ नहीं है. इसका फ़ायदा आख़िर आप ही को होना है. ग़लतियाँ जानने की कोशिश करना, लोगों से ग़लतियाँ पूछना, कोई बताये तो नाराज़ न होना, उन्हें सुधारना (ग़लतियों को, बताने वालों को नहीं :)), शब्दकोषों की मदद लेना, ये इस दिशा में कुछ शुरुआती क़दम हो सकते हैं.

आलोक तो फिलहाल व्यस्त लगते हैं. सोच रहा हूँ उनके काम को मैं जारी रखूँ. तो जहाँ तक हो सकेगा कोशिश करूँगा कि चिट्ठों को पढ़ते समय अगर मुझे कुछ ग़लत लगे तो टिप्पणी में लिख दूँ. अगर किसी को अपने चिट्ठे पर मेरा ऐसा करना बुरा लगे तो ज़रूर बताए. मैं आगे से वहाँ ऐसा नहीं करूँगा. साथ ही मेरी ग़लतियों पर भी ध्यान दिलाएँ, आभारी हूँगा.

Thursday, September 14, 2006

हिंदी का एक दिन

सरकार का कहना है कि आज हिंदी दिवस है.

प्राकृतिक भाषाएँ एक दिन में जन्म नहीं लेतीं, इसलिये उनके जन्म-दिवस नहीं होते. यही कारण है कि आपने कभी फ़्रांसीसी दिवस या अँगरेज़ी दिवस नहीं सुने होंगे. ऐसे देशों में भी जहाँ माँ-बाप-भाई-बहन-पत्नी-चाचा-ताउओं के लिए भी दिन तय होते हैं, किसी भाषा का कोई ख़ास सरकारी या ग़ैरसरकारी दिन नहीं होता. फिर हमें ये क्या सूझी?

देखा जाए तो ग़लती तकनीकी है. १४ सितम्बर को हिंदी दिवस मनाने का कारण यह नहीं कि इस दिन हिंदी का जन्म हुआ था, या उस दिन इसका नाम पहली बार हिंदी पड़ा. बल्कि यह है कि १९४९ की १४ सितम्बर को हिंदी को भारत की राजभाषा का दर्जा मिला था. तो क़ायदे से इसे राजभाषा दिवस कहा जाना चाहिए. भाषा दिवस कह लीजिए. पर हिंदी दिवस? ग़लत समझ में आता है.

अब ये बात बिल्कुल अलहदा है कि राजभाषा बनकर हिंदी को फ़ायदे कम नुकसान ज़्यादा हुए. सरकारी हिंदी बन गई औपचारिक, रूखी और अनुवाद की भाषा. और वह भी बस खानापूर्ति को, बल्कि कई बार उतनी भी नहीं. न तो यह सही मायनों में राजभाषा बन सकी न सरकारी काजभाषा.

इसके कारण कई रहे होंगे और मैं उनमें नहीं जाना चाहता, पर हिंदी समेत भारतीय भाषाओं के विकास को सरकारी मशीनरी ने अवरुद्ध भले ही किया हो, गति तो नहीं दी. अगर हिंदी फिर भी जनभाषा है, विश्व में तीसरी-चौथी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली ज़ुबान है, दिनों-दिन नये शब्द ग्रहण करती जीवंत बोली है, तो यह सरकारी मशीनरी के प्रयासों के बावजूद है, उनके कारण नहीं.

पर मनाने दीजिये सरकार को राजभाषा का एक दिन. आखिर यह आधिकारिक मामला है. इस बहाने साल में एक दिन तो समीक्षा करें कि आधिकारिक तौर पर इस दिशा में क्या काम हो रहा है. बस इसे हिंदी दिवस कहा जाना थोड़ा खटकता है. वैसे ही जैसे अगर आप स्वतंत्रता दिवस को भारत दिवस कहने लग जाएँ.

Monday, August 28, 2006

अनुवादकों के लिए कुछ 17-18 सुझाव

1. शुरू करने से पहले पूरा मूल-पाठ एक बार पढ़ लें. कथन के सार और शैली का एक अंदाज़ा ले लें. अपने अनुवाद में उसी कथ्य-शैली (मज़ाकिया, औपचारिक, तकनीकी, आदि) का प्रयोग करें.

2. विषय को जानें. शोध करें. अगर विषय-वस्तु पर आपकी पकड़ गहरी नहीं तो आपको मूल पाठ को ठीक-ठीक समझकर अनुवाद में स्पष्टतः व्यक्त करने में कठिनाई होगी.

3. अपने मुख्य पाठकवर्ग को पहचानें और उनके लिए अनुवाद करें. यदि आप किसी तकनीकी लेख का आम जनता के लिए अनुवाद कर रहे हैं तो कोशिश करें कि गूढ़ तकनीकी शब्दों (जार्गन) की बजाय धारणा (कांसेप्ट) को समझाने वाले वाक्य हों. अनुवाद को इस कसौटी पर उतारें कि क्या आपके पिता या माँ इसे समझ पाएँगे.

4. भाषा की बारीकियाँ, उसके मुहावरे बहुत महत्वपूर्ण होते हैं. ज़रूरी है कि संबंधित भाषाओं के बोलचाल और लेखन दोनों रूपों पर आपकी अच्छी पकड़ हो, पर खासकर लक्षित भाषा (हिंदी) पर.

5. भाषा सहज रखें - यह सबसे ज़रूरी नियम है. लेख में रवानगी होनी चाहिए. अनुवाद को उच्चारित करके पढ़ें और देखें कि ठीक लग रहा है या नहीं.

6. व्याकरण को सामान्य मानक बोलचाल वाली भाषा के करीब रखें. जब तक कि विषय की माँग न हो, क्षेत्रीय या आंचलिक लहजों/रूपों से परहेज करें. स्लैंग या भ्रष्ट रूप का प्रयोग मत करें.

7. नामों या नाम-रूपी संज्ञाओं को अनुवादित न करें. उदाहरण के लिए, 'इंटरनेट' एक नाम है, इसके अनुवाद की आवश्यकता नहीं. जबकि 'इंट्रानेट' एक तकनीकी विषय है, इसका अनुवाद करें.

8. विचारों, विषयों, धारणाओं को व्यक्त करने वाले पदों का अनुवाद करें, पर शब्दशः नहीं. इनके लिए ऐसे शब्दों या शब्दयुग्मों का प्रयोग करें जो पाठक को संबंधित विषय सबसे बढ़िया तरीके से समझा पाएँ. यदि आप आम रोजमर्रा जीवन से कोई समतुल्य विचार ढूँढ़ पाएँ, तो उसके लिए प्रयुक्त मौजूदा शब्द सबसे बेहतर काम करेगा.

9. पहले तद्भव. तकनीकी संकल्पनात्मक पदों के लिए हिंदी में नए शब्द ढूँढ़ते समय इस क्रम में देखें:
1) तद्भव/देशज
2) तत्सम
3) हिंदी में लोकप्रिय अन्य शब्द (विदेशी समेत)

अगर इनमें कोई उपयुक्त शब्द न ढूँढ़ पाएँ तो मूल शब्द को ही रख लें.

10. मूल विदेशी शब्द को लेते समय इस बात का ध्यान रखें कि उसके उच्चारण में यथोचित बदलाव हो ताकि
1) वह आम जनता द्वारा बोलने में आसान हो
2) उसे मौजूदा उपलब्ध अक्षरों/चिह्नों की मदद से लिखा जा सके

नागरी, अपने वर्तमान संशोधित रूप में, हिंदी ध्वनियों की आवश्यकता पूरी करने में समर्थ है. विदेशी शब्द उधार लेते समय उन्हें नागरी में आम तौर पर प्रयुक्त अक्षरों/चिह्नों के प्रयोग से ही लिखें. अनजान ध्वनियों के लिए उनके पास के उच्चारण वाले अक्षर प्रयोग करें. पर नए अक्षर या चिह्न मत गढ़ें.

11. हास्यास्पद या अटपटे पद न गढ़ें. चल नहीं पाएँगे. 'लौहपथगामिनी' को ले लीजिए. हालाँकि 'ट्रेन' का यह अनुवाद तकनीकी रूप से ग़लत नहीं है, पर अपनी अनावश्यक जटिलता से महज हँसी की चीज़ बनकर रह गया है. दूसरी तरफ़, 'रेलगाड़ी' सफल भी है और सही भी.

12. दुनिया भर में होने वाली नई खोजों के नाम सामान्यतया उनके खोजकर्ता रखते हैं और वे स्वाभाविक रूप से उनकी भाषा में होते हैं. इनका अनुवाद न करें. उच्चारण को हिन्दी की प्रकृति के अनुकूल बनाने के बाद इन्हें ज्यों का त्यों ले लें.

13. नए शब्द गढ़ने का मोह त्यागें. अगर आप पढ़ते-लिखते रहें और दुनिया से जुड़े रहें तो पाएँगे कि आपको ऐसा करने की ज़रूरत बहुत कम पड़ेगी. यदि किसी ने पहले ही किसी पद के लिए ठीक-ठाक हिन्दी अनुवाद प्रस्तावित कर दिया है, तो उसे ही काम में लें.

14. इस बात को स्वीकारें कि सूचना तकनीक की शब्दावली मुख्यतः अमेरिकी अँगरेज़ी में है, उसी तरह जिस तरह योग से संबंधित शब्दावली संस्कृत में. कई ऐसे तकनीकी पद हैं जिन्हें हिंदी प्रयोक्ता उनके मूल अँगरेज़ी रूप में शायद बेहतर समझ और याद रख पाएँगे. अगर ऐसा लगे तो उन पदों को ज्यों का त्यों ले लें.

15. वर्तनी या हिज्जे ठीक रखें. अशुद्ध वर्तनी न केवल भ्रम पैदा कर सकती है, बल्कि आपके अनुवाद की विश्वसनीयता भी ख़त्म कर देती है.

16. जब शंका हो तो शब्दकोषों की मदद लेने में कोई संकोच न करें. पर केवल अच्छे, प्रतिष्ठित शब्दकोषों की.

17. याद रखें कि अनुवादक (और लेखक के भी) के तौर पर आपकी मुख्य जिम्मेदारी अपने पाठक तक ठीक-ठीक संप्रेषण की है. अपनी विचारधारा को इस काम में आड़े न आने दें. पर साथ ही, आलस्यवश या अज्ञानवश अँगरेज़ी शब्दों को अनुवादित किए बिना छोड़ कर अपने पाठक के प्रति असम्मान भी मत जाहिर करें. हँगरेज़ी या हिंगलिश मत लिखें.

18. और यह भी याद रखें कि समय और अनुभव के साथ ही अनुवाद में निपुणता आती है. इसलिए खूब अनुवाद करें.