Wednesday, April 11, 2007

अपनी भाषा में मैं स्मार्ट हूँ

प्रवासियों के सबसे बड़े दर्दों में भाषा का दर्द होता है. पर भारतीय आप्रवासियों द्बारा ये बात उतनी मुखरता से नहीं उठती नज़र आती, कम से कम सामूहिक मंचों पर. कारण हमारी ख़ुशफ़हमी हो या हीनताबोध या फिर देश से साथ ढोकर लाया हुआ अंग्रेज़ी के ऊँचे स्टेटस का ठप्पा, पर खुले तौर पर बहुत कम आधुनिक भारतीय आप्रवासी मानते हैं कि उनकी अंग्रेज़ी अच्छी नहीं.

ड्रैगन टोडोरोविक जोकि एक सर्बियाई पत्रकार हैं 1995 में युगोस्लाविया से जाकर कनाडा बस गये थे. उन्होंने हाल में एक रेडियो शो (In My Language I am Smart - The Immigrant Song) में अपने भाषा अनुभव का ज़िक्र किया. इसकी ऑडियो क्लिप उनकी साइट पर रखी है. सुनने लायक है. बड़ी सटीकता से उन्होंने इस नब्ज़ पर हाथ रखा है. अपनी साइट पर इससे जुड़े एक नोट में वे लिखते हैं (मूल अंग्रेज़ी में ही उद्धृत कर रहा हूँ, अगर किसी को अनुवाद चाहिए तो बताएँ),

I realized quickly that I had a problem. It was not so much with my vocabulary, or my spelling­—on the contrary, that part of my education was very good—but with the precise meaning and finesse of expression.
[...]
Language is acquired with its sound, and the sounds I had picked from records and movies were harsh, aggressive, and presented me in a very different light from who I was and am. Suddenly I realized that somewhere in the process of acquiring the tone of modern English I had lost my identity. It was painful to realize that in my language I was smart, but I sounded stupid in English. Example: while walking with my Canadian friend one day by a church, he started talking about the architecture of that particular building, and while I wanted to say a few things about how I liked the Gothic details on the arch at the entrance, and how I admired the intelligent choice of stones, all I could squeeze out was, “Yeah, it’s cool”.

Acquired meaning is superficial. Sound puts word into context, but the deeper shades of expression are not learned. I responded the way that Clint Eastwood, or some other action hero, would in one of their roles. Back in Serbian language I was connoisseur of arts; in my newly acquired language I was a cop.
[...]
The process of learning a new language is not rounded and simple: at first, it is not the language as a whole that is acquired, but a series of foreign words is superimposed onto mother's tongue. Unavoidably, one has to go through a mutation that is both painful and funny. This piece is an exploration of the immigrant's experience.

वे पूछते हैं,
Where do I belong after going through this experience?

भारतीयों की सोचें तो ये सवाल केवल आप्रवासियों का नहीं है. लगभग सभी अंग्रेज़ी-शिक्षित भारतीय अंग्रेज़ी में बोलकर अपनी बात भली-भाँति और सटीकता से समझा पाने के मामले में अक्षम हैं. और अगर बात किसी गम्भीर विषय पर हो तो पूछिये मत. आप्रवासियों की तो ख़ैर मज़बूरी है. देशवासियों के पास क्या जवाब है?

[लैंग्वेजहैट के जरिये]

12 comments:

मिर्ची सेठ said...

विनय भैया हम तो यहाँ आकर त्रिशंकू से हो गए हैं। हिन्दी लिखने बैठते हैं तो विचार अंग्रेजी में आते हैं फिर शब्दकोश.कॉम पर जाकर उसकी हिन्दी देखते हैं। अंग्रेजी में लिखने बैठते हैं तो कभी कभी वाक्य इत्ने लंबे हो जाते हैं कि फिर उन्हे काट काट कर दो-तीन में बांटते हैं।

अभय तिवारी said...

बहुत बड़ा सवाल उठाया है आपने.. और सच है ये अकेले प्रवासियों का प्रश्न नहीं है.. वे सारे लोग जो हिन्दी भाषा क्षेत्र से हैं.. इस दर्द के निशाने पर हैं..कुछ इसे पहचानते हैं.. कुछ उससे छुटकारा पाने की फ़िराक़ में रहते हैं.. जहाँ तक मैं समझता हूँ ये दुर्दशा हिन्दी में ज़्यादा है बांग्ला, गुजराती आदि में कम होगी.. हिन्दी वैसे भी किसी की मातृ भाषा नहीं.. गाँवो से एक दम कट गये और शहर में शुरु से पलने वाले कुछ लोगों की बात छोड़ दें तो.. अवधी भाषा संसार में पैदा हुआ आदमी खड़ी बोली में ठीक से उकड़ूँ नहीं बैठ पाता..बात लम्बी है.. इस पर और बात होनी चाहिये..

Raviratlami said...

अपने इदर भी येइच हाल है--- न हिंदी ठीक है न अंग्रेज़ी!

Shuaib said...

आपकी बात से सहमित हूं और मेरी भाषा हिन्दी अंग्रेज़ी उर्दू की खिचडी है :(

Jagdish Bhatia said...

शायद सब जगह यही हाल है। लिखते समय तो फिर भी हम उचित शब्द सोच कर लिख लेते हैं या जैसा पंकज जी ने कहा कि शब्दकोश देख लेते हैं पर जब धाराप्रवाह बोलना होता है तो माइंड में जो वर्ड पहले आ जाता है उसी को पिक कर लेते हैं :)

Atul Sharma said...

हाँ ये समस्या तो है। मेरी शिक्षा हिन्दी माध्यम से हई। अँगरेजी का ज्ञान काम के दौरान ही हुआ। आज भी जब अँगरेजी लिखता या बोलता हूँ तो दिमाग में पहले हिन्दी दस्तक दे ही देती है।

प्रियंकर said...

प्रतिरोपित व्यक्ति के व्यक्तित्व में भाषा और संस्कृति का गुरुत्व-केन्द्र हिल जाता है . हम व्यक्ति नहीं होते हैं बल्कि 'अनुव्यक्ति' (अनूदित व्यक्ति) होते हैं -- ट्रांस्लेटेड पर्सन . आदमकद तो आदमी अपनी भाषा में ही हो सकता है .

v9y said...

@पंकज,
जैसा जगदीश ने लिखा, लिखने में तो हमें फिर भी मोहलत मिलती है, उसे सुधारा भी जा सकता है, पर बोलते वक़्त की समस्या तो गम्भीर है.

@अभय,
आपने अच्छी बात उठाई. यह विभाजन हिंदी के भीतर भी दिखाई देता है. पर मेरा मानना है कि इतना गहरा नहीं है, व्याकरण और शब्दों का सामीप्य इसे कम कर देता है.

किसी भाषा में धाराप्रवाहिकता या बेहतर तरीके से विचार संप्रेषण के लिए ज़रूरी है कि वह भाषा आपके बड़े होने के समय आपके माहौल की भाषा रही हो - घर में, दोस्तों में, या आम बाज़ार में बोली जाने वाली भाषा (ये एक से ज्यादा भी हो सकती हैं). वह भाषा जो आपने किताबों से न सीखी हो. अंग्रेज़ी भारत में मुश्किल से 2-3% लोगों के माहौल की भाषा होगी. यह तथ्य इस समस्या की जड़ में है.

@रवि, शुएब, अतुल,
ये हाल लगभग हम सबका है और इसीलिए इसके बारे में सोचने और कुछ करने की ज़रूरत बढ़ जाती है.

@प्रियंकर,
इस बारे में केदारनाथ सिंह की वे पंक्तियाँ मुझे बिल्कुल उपयुक्त लगती हैं, जो मैंने आप ही के ब्लॉग पर सबसे पहले देखी थीं:

"जैसे चींटियां लौटती हैं बिलों में
कठफ़ोड़वा लौटता है काठ के पास
ओ मेरी भाषा! मैं लौटता हूं तुम में
जब चुप रहते-रहते अकड़ जाती है मेरी जीभ
दुखने लगती है मेरी आत्मा"

आह, बिल्कुल अपनी बात. पर क्या ख़ूबसूरती से.

Shrish said...

अंग्रेजी में तो अपुन को जरुर बोलने में समस्या है लेकिन हिन्दी में हम स्मार्ट हैं, आप इसे मेरा वहम मान सकते हैं पर मैं ऐसा सोचता हूँ।

Punit Pandey said...

Hi Vinay, I am thinking of aggregating DesiPundit RSS on HindiBlogs.com. I tried the RSS URL for Hindi given but it seems that it is not working. Please check if you can get that.

Thanks & Regards,

Punit Pandey

Anonymous said...

दो प्रष्ण:

should you not have said 'भाषाटोपी' instead of 'लैंग्वेजहैट'?

did you really mean अक्षम or सक्षम? [i don't have my dictionary in front of me, but i think i got the right meanings of the two words.]

- s.b.

v9y said...

@s.b.,

'Languagehat' is a name and one shouldn't translate names, should one?.

I meant 'अक्षम' which means 'incapable'. My point was that most Indians can't use English for conveying fine, subtle, or serious thoughts. It is specially true for topics out of their work domains. They can do so better in their mother tongues, but they choose not to.

P.S.: 'प्रष्ण' should be spelt as 'प्रश्न'.