Wednesday, May 28, 2008

वैश्वीकरण का भाषाओं पर असर

फ्रीकोनॉमिक्स के स्टीवन डबनर ने अपने ब्लॉग पर एक पैनल से सवाल किया - वैश्वीकरण का भाषाओं पर क्या असर होगा?

चार लोगों का पैनल ("कोरम") था और जवाब दिलचस्प हैं. उनमें आशाएँ और आशंकाएँ दोनों दिखती हैं.

जॉन हेडन, जो अंग्रेज़ी सीखने वालों की एक सोशल वेबसाइट चलाने वाली कंपनी के प्रेसिडेंट हैं, का मानना है कि अंग्रेज़ी की प्रभुता जाते देर नहीं लगेगी. अभी व्यापारिक विश्व का केंद्र अंग्रेज़ी बोलने वाले देशों में है. पर ऐसा बदल भी सकता है -

English is like a cell phone provider offering the best plan. But if the dollar continues to drop, the most viable option could shift.
शायद ऐसा हो, पर ये कहना कि
[...] if you’re bidding on a contract in India, the proposal written in Hindi is sure to stand out.
उँ उँ... हमें पता है कि ऐसा है नहीं.

दूसरी ओर, हेनरी हिंचिंग्स, जो एक लेखक हैं, ज्यादा उत्साहित नहीं हैं -
It’s interesting that we think of nature conservation as something rather sexy, but language conservation on the whole gets dismissed as naïve and backward-looking.
उनके अनुमान में अधिकतर भाषाओं का भविष्य निराशाजनक है -
Realistically, fifty years from now the world’s big languages may be as few as three: Mandarin Chinese, Spanish, and English. Hindi, Bengali, Urdu, and Punjabi will also be pretty big — but chiefly because of massive population growth on their home turf. Arabic, too, will have grown — for religious reasons at least as much as economic ones.
At the other end of the scale, many languages will have disappeared, irrecoverably, and with them will have disappeared their cultures.
लैंग्वेज़ लॉग के मार्क लिबरमैन राष्ट्रीय या आधिकारिक भाषाओं को अधिक महत्व दिए जाने और स्थानीय छोटी भाषाओं के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैये का अंत ऐसे देखते हैं -
If you’re going to combine many countries with different national languages — and do it by political compromise rather than by military conquest — then you can’t impose any single national language on the result. And once you admit a dozen or so national languages to official status in the resulting union, why not throw in a hundred more [...]?
उनका इशारा साफ-साफ भारत की स्थिति की ओर है. पर उनके जवाब में शामिल हिंदी और भारतीय भाषाओं की मिसाल पूरा सच नहीं बयान करती -
In 1950, the Indian constitution established Hindi as the official language of the central government, and the use of English as a “subsidiary official language,” inherited from the days of British colonial rule, was supposed to end by 1965. However, less than a sixth of the Indian population speaks Hindi natively, and for elite speakers of India’s other 400-odd languages, especially in the south, the imposition of Hindi felt like a kind of conquest, whereas continued use of English was an ethnically neutral option. So today, the authoritative version of acts of parliament is still the English one, Supreme Court proceedings are still in English, and so on.
पाठकों के कमेंट भी रोचक हैं. नम्बर 45 में एक पाठक, लिबरमैन की हिंदी मिसाल के जवाब में लिखते हैं -
It amazes me that anyone could claim India as an “English-speaking nation” anymore, and I strongly disagree with Mark Liberman above. I do a lot of work in India, and if anything, Hindi and other indigenous languages are rapidly gaining there, *at the expense of English*. Liberman seems to believe that English is viewed as a “neutral language” in multilingual nations, but that’s not the case– the political association of English with a resented colonial power led to its decline in Malaysia, Yemen, Burma and Iraq among other places, and is possibly behind the decline of English in Hong Kong.
अनुमानों की ही बात है तो मेरा मानना है कि वैश्वीकरण के वर्तमान बाज़ार की भाषा मुख्यतया अंग्रेज़ी होने के बावजूद, तकनीकी प्रगति और इंटरनेट की व्यापकता भाषाई विविधता को मजबूत ही करेगी. अंग्रेज़ी कम से कम आने वाले कई सालों तक तो विश्व व्यापार और कुछ विशिष्ट विषयों की भाषा बनी रहेगी. पर अंग्रेज़ी जानना और अंग्रेज़ी बोलना अलग-अलग बातें हैं और यही स्थिति आगे रहेगी. कामचलाऊ अंग्रेज़ी जाननेवालों की संख्या में इजाफा होगा. रोजमर्रा या पसंद से अंग्रेज़ी बोलने वालों का प्रतिशत घटेगा.

स्थानीयता भाषा का एक मूल तत्व है. वैश्वीकरण इस तत्व के विरुद्ध काम करता है. यह खिंचाव भाषा के नए रूपों को जन्म दे सकता है और शब्दों की हेराफेरी बढ़ सकती है. पर यह नहीं भूलना चाहिए कि सफल वैश्वीकरण का मूल मंत्र है - स्थानीयकरण. "Be Global, Act Local" स्थानीय भाषाओं के हित में ही जाएगा. अभी तक तो यही दिख रहा है.