Saturday, July 08, 2006

लिखाई में प्रचलित १० ग़लतियाँ..

..जिनके प्रयोग से आप बेवकूफ़ दिखते हैं
(जोडी गिल्बर्ट के अँगरेज़ी लेख से प्रेरित)

पहले बता दूँ कि यहाँ मैं टाइप में भूल से हो जाने वाली अशुद्धियों (जिन्हें अंग्रेज़ी में 'टाइपो' कहते हैं) की बात नहीं कर रहा हूँ। ऐसी गलतियाँ तो सबसे होती हैं (हालाँकि इनका ध्यान रखना भी बहुत ज़रूरी है)। पर जब ये गलतियाँ अज्ञान के कारण होती लगती हैं, तो पाठक की नज़रों में आपका "भोंदू स्कोर" बढ़ने लगता है। और आपकी व आपकी बात की विश्वसनीयता उसी अनुपात में घटने लगती है। ये रहीं दस ऐसी व्याकरण या वर्तनी की गलतियाँ।

१. जहाँ नुक़्ता नहीं लगता, वहाँ नुक़्ते का प्रयोग

गलत - क़िताब, फ़ल, सफ़ल, फ़िर, ज़ंज़ीर, शिक़वा, अग़र
ठीक - किताब, फल, सफल, फिर, ज़ंजीर, शिकवा, अगर

२. बिंदु (अनुस्वार) की जगह चन्द्रबिंदु (अनुनासिक)

गलत - पँडित, शँकर, नँबर, मँदिर
ठीक - पंडित (या पण्डित), शंकर, नंबर (या नम्बर), मंदिर (या मन्दिर)

३. है की जगह हैं

गलत - रहना हैं तेरे दिल में
ठीक - रहना है तेरे दिल में

४. में और नहीं की बिंदी गोल कर जाना

गलत - जो बात तुझमे है तेरी तस्वीर मे नही
ठीक - जो बात तुझमें है तेरी तस्वीर में नहीं

५. रेफ को एक अक्षर पहले लगाना

गलत - मेरा आर्शीवाद तुम्हारे साथ है।
ठीक - मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है।

६. सौभाग्याकांक्षिणी की जगह सौ.कां.

गलत - सौ.कां. सुशीला के विवाह में अवश्य पधारें।
ठीक - सौभाग्याकांक्षिणी (या, सौ.) सुशीला के विवाह में अवश्य पधारें।

७. की जगह , या की जगह

गलत - पडोस, पढाई, हडताल
ठीक - पड़ोस, पढ़ाई, हड़ताल

८. अपने की जगह मेरे/तुम्हारे/उसके का प्रयोग

गलत - मैं मेरे घर जा रहा हूँ, तुम तुम्हारे घर जाओ।
ठीक - मैं अपने घर जा रहा हूँ, तुम अपने घर जाओ।

९. कि की जगह की, या उल्टा

गलत - क्योंकी शतरंज कि बाज़ी में ध्यान बँटा की हारे।
ठीक - क्योंकि शतरंज की बाज़ी में ध्यान बँटा कि हारे।

१०. बहुवचन संबोधन में अनुनासिक

गलत - आओ बच्चों! तुम्हें दिखाएँ..
ठीक - आओ बच्चो! तुम्हें दिखाएँ..

6 comments:

Balasubramaniam said...

लेख बहुत अच्छा है, किंतु कई महत्वपूर्ण विषय छूट गए हैं, जैसे:

1. गए-गये, हुए-हुये, लाई-लायी, लताएं-लतायें आदि में प्रथम रूप ही आधुनिक हिंदी में मान्य हैं।

2. आपने पंडित, डंडा आदि में पण्डित, डण्डा आदि को वैकल्पिक सही वर्तनी बताया है, जबकि एकरूपता की दृष्टि से केवल अनुस्वार वाले रूपों को ही माना जा सकता है (पंडित, डंडा, आदि)। यहां पंचमवर्ण वाले नियम को यदि स्पष्ट किया जाता तो पाठकों को इसकी अधिक समझ आती:

व्यंजन का उसी के वर्ग के पंचम वर्ण से मेल होने पर अनुस्वार लगता है। उदाहरण- क वर्ग - क ख ग घ ङ - में पंचम वर्ण ङ है। गङ्गा को गंगा लिखना चाहिए, इत्यादि।

3. हिंदी में बहुत से दुहरे रूप चलते हैं इनमें से जो सही है, उसकी सूची (अपूर्ण ही सही) देनी चाहिए थी। उदाहरण - दुपहर-दोपहर, छिपना-छुपना, घबड़ाना-घबराना, उपर्युक्त-उपरोक्त, इत्यादि।

4. नुक्ता के रूप में मेरी राय है कि ड और ढ के सिवाए किसी अन्य वर्ण में इसे नहीं लगाना चाहिए क्योंकि अब उर्दू शिक्षण की व्यवस्था भारत में लगभग समाप्त हो जाने से अधिकांश हिंदी भाषी उर्दू उच्चारण से परिचित नहीं हैं और ज़मीन, ज़्यादती आदि शब्दों को जमीन, ज्यादती आदि के रूप में ही बोलते हैं।

5. चंद्रबिंदु (कँ) का प्रयोग भी अब छोड़ा जा रहा है। अधिकांश पत्र-पत्रिकाओं में इसका उपयोग नहीं होता। अनेक प्रतिष्ठित प्रकाशक भी इसका उपयोग नहीं कर रहे हैं। इसलिए नए लेखकों को चंद्रबिंदु की जगह अनुस्वार (कं) के प्रयोग की सलाह दी जा सकती है।

बहरहाल आपका लेख श्रेष्ठ स्तर का है। इसके और विकसित करके पुस्तकाकार रूप में एक स्टाइल बुक के रूप में प्रकाशित करना चाहिए।

Vinay said...

बाला,

आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद। ये विषय छूटे नहीं है। मेरा उद्देश्य आम ग़लतियों को प्रकाशित करना था। आपके लिखे विषय मानकीकरण से संबंधित हैं। फिर मेरा 'क़ोटा' बस १० ग़लतियों का ही था :)। बहरहाल, आपने जिन मानकीकरण मुद्दों का ज़िक्र किया है, वे विस्तार से यहाँ पहले से ही उपलब्ध हैं:

http://www.giitaayan.com/hindispelling.asp

rachana said...

विनय जी नमस्ते! मैने अभी-अभी ही हिन्दी टाईप करना सीखा है."हिन्दिनी" का उपयोग करती हूँ.कोशिश करती हूँ गलतीयाँ न हो लेकिन अब भी "पडोस" के लिए उपयुक्त 'ड' तथा 'अनुस्वार'नही ढूँढ नही पाई हूँ! उपयोगी साइट बताने का शुक्रिया.

Vinay said...

रचना:
अगर आप कोई ऑनलाइन उपकरण ढूँढ़ रही हैं (जिसमें ड़ और ढ़ टाइप किया जा सके) तो यह देख सकती हैं:
http://www.giitaayan.com/x.htm

Aseem Srivastava said...

bahut achchha lekh hai.naye vidyarthiyon ke liye maarg darshak.lekhak ko theek se maloom hai ki kaun si galtiyan adhik hoti hain.Yadi kabhi koi sandeh ho to mujhse aseeem@indiya.com par sampark kar sakte hain.

अभिनव said...

उत्तम लेख हेतु धन्यवाद, मैं भी ध्यान रखूँगा कि इस प्रकार की ग़लतियाँ न हों।