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Monday, June 30, 2008

रेसिज़्म का एक भारतीय रूप

मृणाल पांडे भारतीय अकादमिक और पत्रकारिता जगत में व्याप्त भाषाई रेसिज़्म (नस्लवाद) के बारे में लिखती हैं:

I’ve known a lot of academicians and journalists who seriously believe that because they are eminent intellectuals they cannot be racists. As if being the one automatically rules out the other.
[...]
It is surprising that linguistic racism has never properly been debated in our urban feminist forums. Most Indian feminists who defend equality for women in all spheres continue to do so in English, which less than 3% of women understand. They are either unable or simply unwilling to recognize and confront this as an internal problem. Long innings in college staffrooms have also made me realize that while we all know that a tight segregation of students based on their proficiency in English exists on campuses, most of us would not admit to it within our own profession.
भाषाई नस्लवाद एक ऐसा विषय है जिससे भारतीय बुद्धिजीवी ने हमेशा मुँह चुराया है और जहाँ उसकी हिपोक्रिसी (पाखंड) और उसका दोहरा चरित्र साफ़ देखा जा सकता है. मृणाल इस मुद्दे को उठाने के लिए बधाई की पात्र हैं. पूरा लेख.

Tuesday, May 27, 2008

महेश भट्ट : फिल्मी सितारों का हिन्दी नहीं बोलना अपनी माँ को गिरवी रखने जैसा

फिल्मी और टीवी दुनिया से जुड़ा हर सितारा न्यूयॉर्क टाईम्स में अपनी खबर और फोटो देखना चाहता है जबकि उसको नाम और पैसा हिन्दी के दर्शकों से मिलता है। आज हर सितारा अपनी शख्सियत और अपनी पहचान अंग्रेजी में बनाना चाहता है, आज फिल्म उद्योग में हिन्दी न जानना और गलत हिन्दी बोलना सम्मान की बात हो गई है। महेश भट्ट ने कहा कि इस अंग्रेजी मानसिकता से पूरा देश आज एक बार फिर गुलाम होता जा रहा है।  

- महेश भट्ट, २७ मई २००७

पूरा लेख, कड़ी के लिए दीवान का आभार।

Wednesday, March 12, 2008

हिंदुस्तानी जॉन डो

अमेरिका में कानूनी मसलों में जब तक किसी पुरुष पक्ष की वास्तविक पहचान नहीं हो पाती उसे अदालती कारवाई में जॉन डो कहा जाता है. महिला पक्ष के लिए यह प्लेसहोल्डर है जेन डो. ये नाम अदालत से बाहर भी अनाम या आम व्यक्ति के तौर पर पहचान के लिए धड़ल्ले से बरते जाते हैं. मसलन, 1941 में फ़्रैंक कैप्रा ने एक फ़िल्म बनाई थी - मीट जॉन डो*, जोकि एक आम आदमी की कहानी थी (न देखी हो तो देख डालिए). इसके अलावा भी पॉपुलर कल्चर में इनका इस्तेमाल आम है.

लगभग हर देश के अपने-अपने जॉन और जेन डो हैं. पर भारत में अभी हाल तक ऐसा कोई नाम प्रचलन में नहीं था. अदालतों में "नामालूम" शब्द से काम चलता आ रहा है. पर आखिर भारतीय कोर्टों ने भी अपना हिंदुस्तानी जॉन डो ढूँढ लिया लगता है. और वह है - अशोक कुमार (दादा मुनि, आप वैसे अमर न हुए होते तो ऐसे हो जाते). महिलाओं के लिए अभी तक कोई विशेष नाम प्रचलन में नहीं है. पर शायद जल्दी ही हो जाए. वैसे मीना कुमारी कैसा रहेगा? ख़ैर..

तो ब्लॉगर साहेबान, अगली बार अगर आपको अशोक कुमार के नाम से कोई टिप्पणी देता दिखे तो उसे एक अनजान, आम आदमी की प्रतिक्रिया मानिएगा, अपने पड़ोसी अशोक बाबू की नहीं.

*90 के दशक में इस फ़िल्म की लगभग हूबहू हिंदी कॉपी जावेद अख़्तर की कलम से निकली थी. नाम रखा था मैं आज़ाद हूँ. पर लगता है भारतीय अदालतों को जावेद अख़्तर का सुझाव जँचा नहीं.

[लैंग्वेजहैट के जरिए]

Friday, February 22, 2008

लिंग्वा फ़्रैंका, पर कब तक?

निकॉलस ऑस्लर Foundation for Endangered Languages के चेयरमैन हैं और Empires of the Word: A Language History of the World और Ad Infinitum: A Biography of Latin किताबों के लेखक. फ़ोर्ब्स के भाषा विशेषांक में लिखे अपने एक हालिया लेख में उन्होंने अंग्रेज़ी के भविष्य पर टिप्पणी की है.

उनका मानना है कि अगर लिंग्वा फ़्रैंकाओं (संपर्क भाषाओं) के इतिहास को देखें तो पता चलता है कि जो 60 करोड़ लोग आज अंग्रेज़ी को दूसरी-भाषा के तौर पर इस्तेमाल करते हैं और इसे सबसे बड़ी संपर्क भाषा बनाते हैं, वही लंबी अवधि में इसके लिए नुकसानदायक होंगे.

संपर्क भाषा या लिंग्वा फ़्रैंका उन लोगों के बीच संवाद की भाषा होती है जिनकी मातृभाषाएँ अलग हों. पुरानी संपर्क भाषाओं में वे लैटिन, क्वेच्वा, फ़ारसी, और अरमेक को गिनाते हैं और आधुनिक युग में स्पैनिश, फ़्रांसीसी, हिंदी, रुसी, और अंग्रेज़ी को.

उनके अनुसार भाषाओं के 5000 साल के दर्ज इतिहास से ये बात स्पष्ट होती है कि संपर्क भाषाओं का फैलाव किसी सुविधा गणित या जनतांत्रिक चुनाव के जरिये नहीं होता, न ही भाषा की सुंदरता या बहाव की वजह से. इसके पीछे हमेशा एक विशेष प्रयासपूर्ण कारण होता है जिसे भुलाना - और अक्सर माफ़ कर पाना - मुश्किल होता है.

ऐतिहासिक संपर्क भाषाओं की बात करते हुए वे कहते हैं:

There was status or wealth to be gained from knowing these languages, and in their heyday, no one believed they might one day go out of use. After all, they seemed not only useful, but also such exceptional languages. Latin--alone of western languages--had grammatica, an analysis of all its rules; French was regulated by an Academy, which would ensure the quality of its substance. Likewise, English, with its simple sentence-structure and openness to borrowed vocabulary, is often thought well suited to be a global medium

पर उनका कहना है कि ये भाषाएँ विचार संप्रेषण का माध्यम मात्र रहने की बजाय अपने फैलाव का बिल्ला लगाए घूमती हैं; और यही अन्ततः उनके पतन का कारण होता है.

Akkadian spread beyond the Assyrian empire on the strength of its pictograph-based cuneiform writing, but then yielded to Aramaic, a language combining widespread use with an alphabetic script. Sogdian, once spoken by merchants and divines from Samarkand to China, could not survive the decline of the Silk Road trade. And in Europe, Latin in the 9th to 16th centuries and French in the 17th to 20th centuries depended on educated elites. Wide use of those languages declined when power passed into other hands.

आज की वैश्विक संपर्क भाषा के बारे में उनका मानना है कि जैसे जैसे झुकाव राजनैतिक लोकतंत्रीकरण की ओर होगा, अंग्रेज़ी का विश्वव्यापी प्रयोग कम होगा, क्योंकि यह सीधे सीधे एलीट (उच्च/कुलीन/संभ्रांत) वर्ग, जोकि अंग्रेज़ी के मुख्य प्रयोक्ता हैं, के स्टेटस को कम करेगा. कहते हैं,

[...] This has already happened. With independence achieved after the Second World War, Tanzania, Sri Lanka, Malaysia and the Philippines all downgraded their official use of English. In India, too, English is beginning to lose its stranglehold on enterprise and education: In February, a major business newspaper in Hindi was launched, likely the first of many. The massive current expansion in Indian higher education (aimed at increasing participation from 10% to 15%) will also lessen the proportion of citizens who are educated in English as opposed to Hindi or another mother tongue.

पूरा लेख पढ़ें.

Tuesday, October 30, 2007

अंग्रेज़ी के माथे एक मौत

On October 22, a 22-year-old second-year B.Tech student of the IEC Engineering College Noida, hanged himself. The suicide note Brajesh Kumar left behind in the room he shared with another student in Tughlakpur village said that he was doing this because he could not cope with the courses being taught in English and that he did not want to burden his family with paying another hefty amount towards special English coaching classes.

हालाँकि यह प्रतिक्रिया अतिवादी है और मैं इसे बिल्कुल ठीक नहीं मानता, यह अंग्रेज़ी के मुद्दे की गंभीरता बयान करती है. उच्च शिक्षा का माध्यम मातृभाषा से अलग होना भारत की कई पीढ़ियों के करोड़ों छात्रों का सिरदर्द रहा है.

मृणाल पांडे का समाधान है कि अंग्रेज़ी को सरकारी स्कूलों की प्राथमिक क्लासों में अनिवार्य विषय बना दिया जाए. मेरा मानना है कि हालाँकि वह भी होना चाहिए (क्योंकि अंग्रेज़ी के साधारण ज्ञान की वर्तमान उपयोगिता से कोई इंकार नहीं कर सकता) पर ज़्यादा ज़रूरी यह है कि उच्च शिक्षा का माध्यम स्थानीय भाषा हो. आधुनिक तकनीकी विषयों पर अच्छी गुणवत्ता की पठन पाठन सामग्री स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध हो. स्कूलों में पढ़ाई गई भाषा कितना भी कर ले एक माध्यम के तौर पर उस भाषा का स्थान नहीं ले सकती जो प्राकृतिक तौर पर बोलकर सीखी जाती है. और संवाद के तौर पर तो कतई नहीं.

आश्चर्य इस बात का है कि ऐसा अभी तक हुआ क्यों नहीं. क्या हिंदी का बाज़ार अभी भी इतना बड़ा नहीं कि वह हिंदी में शिक्षा की माँग कर सके? या यह उस छोटे, पर ताकतवर, अंग्रेज़ी समाज के प्रतिरोध की वजह से है ताकि वह शेष भारत की प्रतिद्वंदिता से बच सके और अपना प्रभुत्व बनाए रख सके? या बस इस पर अभी तक किसी का ध्यान नहीं गया? क्या बिना कुछ और ब्रजेश कुमारों की आत्महत्याओं के इस बारे में कोई नहीं सोचेगा? आखिर कब तक ज्ञान 80% लोगों के लिए मुश्किल बना रहेगा?

आप क्या सोचते हैं?

Wednesday, September 26, 2007

अंग्रेज़ी न बोलने वाला भारत

राजदीप सरदेसाई "ट्वेंटी-20 विश्व कप" की भारतीय जीत में हिंदी और भारतीय भाषाओं का बदलता रुतबा देख रहे हैं. उनका कहना है कि महानगरों के बाहर का भारत, अंग्रेज़ी न बोलने वाला भारत अब राष्ट्रीय पटल पर ज़्यादा तेज़ी और मुखरता से उभर रहा है. लेख दिलचस्प है और उस तस्वीर पर ध्यान दिलाता है जिसके बारे में अंग्रेज़ी मीडिया में अक्सर बात नहीं होती. पेश है उनके लेख से संबंधित अंश.

In 1983, those who worked in the non-English media were seen as lesser beings: they got far lower salaries, their rooms were smaller, their stories attracted scant attention. How, after all, could you compare an Oxbridge educated editor with someone from Chaudhary Charan Singh university? Today, quite remarkably, there has been a dramatic change: Hindi TV journalists can demand a price in the marketplace, the energy and robustness of Hindi channels is to be admired (even if it is misdirected at times), and most news networks acknowledge that their Hindi channel viewership is more important than their English audience. A Hindi journalist can no longer be dismissed as an ignorant vernacular; he is now seen as the person with a ear to the ground.

A similar change can be seen in the IITs. In 1983 they were populated by English-speaking graduates. Today’s young IITians come from small towns, their English imperfect, but their educational achievements second to none. The rules of admission remain the same.
हमारा अंग्रेज़ीदाँ समाज, जो अभी भी अधिकतर क्षेत्रों में प्रभुत्व जमाए है, भारतीय भाषाओं के प्रति या तो प्रतिरोधक रवैया रखता है या उदासीन. भारतीय भाषाओं और इसके बोलनेवालों की वह मुखरता जो राजदीप देख रहे हैं इस प्रतिरोध के बावजूद है. बरसों के बाद अपनी भाषा में जीने और अपनी बात रखने के मौके और मंच उन लोगों को बाज़ार और तकनीक ने दिये हैं, शासकों और मालिकों ने नहीं. उनकी सफलता प्रतिकूल परिस्थितियों में संघर्ष से प्राप्त की गई सफलता है.

आज़ादी और प्रगति का एक महत्वपूर्ण मापदंड है स्वावलंबन. भाषा उसकी पहली सीढ़ी है. भाषा का स्वावलंबन देश की प्रगति की शुरुआत होनी चाहिये, उसकी पूर्णता नहीं.

Friday, May 25, 2007

सीने में जलन..

23 मई 2007 - जब मानव इतिहास में पहली बार दुनिया की शहरी आबादी ग्रामीण आबादी से ज़्यादा हो गई.

हाल-ए-हिंदुस्तान

  • 1991 में शहरों में बसने वाली जनसंख्या - लगभग 26%
  • 2001 में - लगभग 28%
  • ...
  • 2026 में (अनुमानित) - लगभग 33% (पीडीएफ़ कड़ी)
  • देश के 25% ग़रीब शहरों में रहते हैं.
  • 31% शहरी ग़रीब हैं.

Thursday, March 29, 2007

तकनीक लोगों के लिए

वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम ने 2006-07 के लिए वैश्विक सूचना तकनीक रिपोर्ट जारी कर दी है. यह रिपोर्ट विश्व के 122 देशों के लिए 'नेटवर्क तैयारी सूचकांक' (NRI) बताती है जो कि 3 घटक सूचकांकों से बना है -
1) देश या समाज द्वारा उपलब्ध कराया गया 'सूचना और संवाद तकनीक' (ICT) का माहौल
2) समाज के प्रमुख हिस्सेदारों की तैयारी (जनता, व्यापार, सरकार)
3) इन हिस्सेदारों में सूचना और संवाद तकनीक का प्रयोग

तो ख़बर यह है कि अमेरिका तकनीकी सिरमौर नहीं रहा. बल्कि आस-पास भी नहीं. पिछले साल के पहले से अब वह सीधे 7वें स्थान पर आ गया है. और अपने आप को आइटी महाशक्ति समझने वाला भारत 44वें स्थान पर है, पिछले साल से 4 स्थान नीचे.

यह रहे शीर्ष 10 देश, ख़ासकर उनके लिए जो कहते हैं अँग्रेज़ी में शिक्षा के बिना तकनीकी तरक्की संभव नहीं.

1. डेनमार्क
2. स्वीडन
3. सिंगापुर
4. फ़िनलैंड
5. स्विटज़रलैंड
6. नीदरलैंड्स
7. अमेरिका
8. आइसलैंड
9. यूके
10. नॉर्वे

भाषा के संदर्भ में ये आँकड़े अगर कुछ बताते हैं तो यह कि तकनीक को हर एक तक पहुँचाने के लिए तकनीक का स्थानीयकरण ज़रूरी है. हमारे यहाँ नीति उल्टी तरफ़ से चल रही दिखती है. हम लोगों का विदेशीकरण करने में लगे हैं.