आदतें कितनी जल्दी गुलाम बना लेती हैं. हालत ये हो गई है कि अब एक दिन के लिए भी कम्प्यूटर (और इंटरनेट) बिल्कुल छोड़ देना लगभग खाना छोड़ने जैसा मुश्किल लगता है. पर मैंने कई बार ऐसा करके देखा है और पाया है कि वो दिन बड़ा बढ़िया गुजरता है. तीन मई को कुछ लोग (डेनिस बाइस्ट्रोव और आशुतोष राजेकर के आह्वान पर) फिर ऐसा करने का बहाना दे रहे है - मौका है शटडाउन दिवस का. चलिए, मेरा कम्प्यूटर तो बंद रहेगा. आप भी कहीं घूम आइए.
Thursday, April 24, 2008
एक दिन कम्प्यूटर के बिना
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Friday, June 15, 2007
1 किलो माने?
क्या आपने कभी सोचा है कि एक किलोग्राम दरसल कितना भारी होता है? कौन बताता है कि इसका ठीक-ठीक वजन क्या है? क्या आपके परचूनी वाले या सब्जी वाले के बाट ठीक एक किलो हैं? हैं या नहीं ये कैसे पता होता है? नहीं सोचा? तो सोचिये. और सोचने की फ़ुर्सत न हो तो आगे पढ़िये.
किलोग्राम एक ऐसा माप है जो किसी भौतिक स्थिरांक पर आधारित नहीं है. बल्कि उसका मानदंड पैरिस के एक वॉल्ट में रखा एक सिलिंडर है. किलोग्राम की परिभाषा के लिए क़रीब 100 साल पहले प्लैटिनम और इरीडियम के मिश्रण से एक सिलिंडर बनाया गया और घोषित किया गया कि "एक किलोग्राम का ठीक मान इस विशिष्ट सिलिंडर का द्रव्यमान है". यानि,
1 मीटर = प्रकाश द्वारा संपूर्ण निर्वात में 1/29,97,92,458 सेकंड में तय की गई दूरी
1 सेकंड = एक निश्चित भौतिक प्रतिक्रिया के 9,19,26,31,770 अन्तराल
पर,
1 किलोग्राम = पैरिस के एक वॉल्ट में रखा सिलिंडर
समझ रहे हैं मुश्किल? क्या हो अगर वो सिलिंडर किसी वजह से खत्म हो जाए? हमारे पास सिर्फ़ उसके अलग-अलग दुनिया भर में फैले प्रतिमान बाक़ी रहेंगे, जो कि समय या वातावरण की मार या कॉपी की ग़लतियों की वजह से अलग-अलग हो सकते हैं. फिर किसका किलो सही और किसका ग़लत माना जाएगा?
ऑस्ट्रेलिया के एक दल ने इस समस्या का हल किया है एक नया प्रोटोटाइप सोचकर जो एक भौतिक स्थिरांक पर आधारित होगा. वे किलोग्राम का निर्धारण इस बात से करेंगे कि एक किलोग्राम में कितने सिलिकॉन अणु होते हैं. इसके बाद किलोग्राम भी मीटर और सेकंड जैसे अन्य मापकों की तरह भौतिक स्थिरांकों के आधार पर परिभाषित हो जाएगा.
[श्लैशडॉट के जरिये]
Friday, May 25, 2007
सीने में जलन..
23 मई 2007 - जब मानव इतिहास में पहली बार दुनिया की शहरी आबादी ग्रामीण आबादी से ज़्यादा हो गई.
हाल-ए-हिंदुस्तान
- 1991 में शहरों में बसने वाली जनसंख्या - लगभग 26%
- 2001 में - लगभग 28%
- ...
- 2026 में (अनुमानित) - लगभग 33% (पीडीएफ़ कड़ी)
- देश के 25% ग़रीब शहरों में रहते हैं.
- 31% शहरी ग़रीब हैं.
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Monday, April 09, 2007
क्या सौन्दर्यबोध परिस्थिति से प्रभावित होता है?
धूप में निकलो घटाओं में नहाकर देखोवाशिंगटन पोस्ट ने जानना चाहा,
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटाकर देखो
- निदा फ़ाज़ली
सुंदरता क्या है? ऐसा कुछ जिसे मापा जा सके (बकौल गॉट्फ़्राइड लेबनीज़), या केवल एक राय (बकौल डेविड ह्यूम), या फिर जैसा इमैन्युएल कांट ने कहा था कि थोड़ी थोड़ी दोनों, पर उसपर दर्शक की तात्कालिक मानसिक अवस्था का भी प्रभाव होता है?इस सवाल का बेहतर जवाब जानने के लिए पोस्ट ने एक मज़ेदार प्रयोग किया.
वाशिंगटन के व्यस्ततम मेट्रो स्टेशनों में से एक है ल'फ़ाँत प्लाज़ा. यहाँ अक्सर सुबह के व्यस्त घंटों के दौरान स्थानीय संगीतवादक वायलिन, गिटार या पियानो बजाते सुनाई दे जाते हैं. गुज़रने वाले अपनी इच्छानुसार डॉलर या चिल्लर इनकी खुली पेटी में छोड़ जाते हैं.
वाशिंगटन पोस्ट ने वहाँ बिठाया (बल्कि खड़ा किया) जोशुआ बेल को. जोशुआ दुनिया भर में ख्यातिप्राप्त वायलिन वादकों में से हैं. इस प्रयोग से तीन दिन पहले ही उन्होंने बोस्टन के सिम्फ़नी हॉल में वायलिनवादन किया था और वहाँ ठीक-ठाक सीटें भी 100 डॉलर में बिकी थीं. पोस्ट ने उनसे स्टेशन के बाहर वायलिन बजाने का आग्रह किया. ठीक उसी तरह जैसे आम स्थानीय कलाकार खड़े होकर बजाते हैं - अकेले, बिना किसी ताम-झाम के, पैसों के लिए पेटी खुली रखकर.
देखना यह था कि क्या एक विश्व-स्तरीय कलाकार, अद्भुत संगीत, और एक उत्तम वाद्य-यन्त्र का मिश्रण एक आम, काम पर जा रहे कम्यूटर के सौन्दर्यबोध को प्रभावित करेगा. क्या एक साधारण माहौल और असुविधाजनक समय में सौंदर्य बरक़रार रहेगा?
क्या हुआ यह विस्तार से जानने के लिए वाशिंगटन पोस्ट का आलेख पढ़िये. घटना की विडियो रिकॉर्डिंग भी वहीं उपलब्ध है.
Sunday, April 01, 2007
अप्रैल फूल
| अप्रैल फूल यानी चेरी ब्लॉसम या सकूरा - जो साल में केवल हफ़्ते भर खिलते हैं. |
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7:26 pm
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