Showing posts with label इतिहास. Show all posts
Showing posts with label इतिहास. Show all posts

Friday, February 22, 2008

लिंग्वा फ़्रैंका, पर कब तक?

निकॉलस ऑस्लर Foundation for Endangered Languages के चेयरमैन हैं और Empires of the Word: A Language History of the World और Ad Infinitum: A Biography of Latin किताबों के लेखक. फ़ोर्ब्स के भाषा विशेषांक में लिखे अपने एक हालिया लेख में उन्होंने अंग्रेज़ी के भविष्य पर टिप्पणी की है.

उनका मानना है कि अगर लिंग्वा फ़्रैंकाओं (संपर्क भाषाओं) के इतिहास को देखें तो पता चलता है कि जो 60 करोड़ लोग आज अंग्रेज़ी को दूसरी-भाषा के तौर पर इस्तेमाल करते हैं और इसे सबसे बड़ी संपर्क भाषा बनाते हैं, वही लंबी अवधि में इसके लिए नुकसानदायक होंगे.

संपर्क भाषा या लिंग्वा फ़्रैंका उन लोगों के बीच संवाद की भाषा होती है जिनकी मातृभाषाएँ अलग हों. पुरानी संपर्क भाषाओं में वे लैटिन, क्वेच्वा, फ़ारसी, और अरमेक को गिनाते हैं और आधुनिक युग में स्पैनिश, फ़्रांसीसी, हिंदी, रुसी, और अंग्रेज़ी को.

उनके अनुसार भाषाओं के 5000 साल के दर्ज इतिहास से ये बात स्पष्ट होती है कि संपर्क भाषाओं का फैलाव किसी सुविधा गणित या जनतांत्रिक चुनाव के जरिये नहीं होता, न ही भाषा की सुंदरता या बहाव की वजह से. इसके पीछे हमेशा एक विशेष प्रयासपूर्ण कारण होता है जिसे भुलाना - और अक्सर माफ़ कर पाना - मुश्किल होता है.

ऐतिहासिक संपर्क भाषाओं की बात करते हुए वे कहते हैं:

There was status or wealth to be gained from knowing these languages, and in their heyday, no one believed they might one day go out of use. After all, they seemed not only useful, but also such exceptional languages. Latin--alone of western languages--had grammatica, an analysis of all its rules; French was regulated by an Academy, which would ensure the quality of its substance. Likewise, English, with its simple sentence-structure and openness to borrowed vocabulary, is often thought well suited to be a global medium

पर उनका कहना है कि ये भाषाएँ विचार संप्रेषण का माध्यम मात्र रहने की बजाय अपने फैलाव का बिल्ला लगाए घूमती हैं; और यही अन्ततः उनके पतन का कारण होता है.

Akkadian spread beyond the Assyrian empire on the strength of its pictograph-based cuneiform writing, but then yielded to Aramaic, a language combining widespread use with an alphabetic script. Sogdian, once spoken by merchants and divines from Samarkand to China, could not survive the decline of the Silk Road trade. And in Europe, Latin in the 9th to 16th centuries and French in the 17th to 20th centuries depended on educated elites. Wide use of those languages declined when power passed into other hands.

आज की वैश्विक संपर्क भाषा के बारे में उनका मानना है कि जैसे जैसे झुकाव राजनैतिक लोकतंत्रीकरण की ओर होगा, अंग्रेज़ी का विश्वव्यापी प्रयोग कम होगा, क्योंकि यह सीधे सीधे एलीट (उच्च/कुलीन/संभ्रांत) वर्ग, जोकि अंग्रेज़ी के मुख्य प्रयोक्ता हैं, के स्टेटस को कम करेगा. कहते हैं,

[...] This has already happened. With independence achieved after the Second World War, Tanzania, Sri Lanka, Malaysia and the Philippines all downgraded their official use of English. In India, too, English is beginning to lose its stranglehold on enterprise and education: In February, a major business newspaper in Hindi was launched, likely the first of many. The massive current expansion in Indian higher education (aimed at increasing participation from 10% to 15%) will also lessen the proportion of citizens who are educated in English as opposed to Hindi or another mother tongue.

पूरा लेख पढ़ें.

Thursday, October 04, 2007

इंटरनेट के जन्मदाताओं के साथ एक शाम

इंटरनेट के आविष्कार की कहानी बॉब कॉन और विंट सर्फ़ से सुनने को मिले, इसे मैं बतौर इंटरनेटजीवी एक दुर्लभ सुख कहूँगा. ये सुख कुछ-कुछ ऐसा ही है जैसा शायद कोई टेलीकॉम इंजीनियर खुद ग्राहम बेल से टेलीफ़ोन की निर्माणगाथा या कोई संस्कृतज्ञ खुद पाणिनी से संस्कृत व्याकरण की रचना के बारे में सुन कर अनुभव करेगा.

जो न जानते हों उनके लिए बता दूँ कि ये दोनों "इंटरनेट के जनक" माने जाते हैं. दोनों ने मिलकर नेट के मूलभूत प्रॉटोकॉल टीसीपी/आइपी का आविष्कार किया था. उसके बिना आज का जीवन कैसा होता इस सोच में जाना तो काफ़ी समय माँगता है, हाँ इतना तो कम से कम कह ही सकता हूँ कि आप मेरा ये लिखा न पढ़ रहे होते.

कल बॉब और विंट शहर (वाशिंगटन, डीसी) में थे. अमेरिका के नेशनल आर्काइव्स (राष्ट्रीय अभिलेखागार) में आयोजित एक चर्चा में दोनों ने करीब डेढ़ घंटे तक खुलकर बात की. हालाँकि चर्चा का मुख्य विषय "इंटरनेट गवर्नेंस की बहस" था, दोनों इंटरनेट के शुरुआती दौर (सत्तर के दशक) के किस्सों से लेकर नेट के भविष्य पर अपने विचारों समेत कई मुद्दों पर बोले. नेशनल आर्काइव्स के छोटे से मैकगॉवन थियेटर में करीब 200 लोग थे जिनमें अमेरिकी सरकार के नुमाइंदे और डीसी इंटरनेट सोसाइटी के सदस्य मुख्य थे. कार्यक्रम के मध्यस्थ थे आर्काइव्स फ़ाउंडेशन के चेयरमैन टॉम व्हीलर.

इस सवाल के जवाब में कि क्या हम आज इंटरनेट को कुशलता से (एफ़िसियंटली) प्रयोग कर रहे हैं, विंट का कहना था नहीं. कई ऐसे परिदृष्य हैं जहाँ ऐसा नहीं हो रहा है. मसलन डाउनलोड और अपलोड बैंडविड्थ में अंतर. उनका कहना था कि पहले ये ठीक था क्योंकि शुरुआती दौर में निर्माता/प्रकाशक कम थे और उपभोक्ता ज़्यादा. पर अब ब्लॉगों और यू-ट्यूब के ज़माने में हर कोई निर्माता है. इस अंतर को समझ कर हमें बदलाव करने होंगे.

बॉब का कहना था कि मैं इस प्रश्न को बहुत महत्वपूर्ण नहीं मानता. जबकि बैंडविड्थ लगभग असीमित है, कुशलता या एफ़िसियंसी हमारी प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए. हमारी प्राथमिकता फ़ंक्शनॅलिटी होनी चाहिये.

बॉब का जवाब मुझे एक और संदर्भ में दिलचस्प लगा. मेरे ख़याल से उनकी ये बात हिंदी के लिए यूनिकोड मानक के उपयोग (ख़ासकर मोबिल यंत्रों पर) के पक्ष में जाती है. यूनिकोड, एस्की जैसे सरल कूटकरणों के मुकाबले ज़्यादा संसाधन (मुख्यतः बैंडविड्थ) माँगता है, पर हिंदी और अन्य ग़ैर-लैटिन लिपियों के लिए अब सवाल संसाधनों का नहीं, सुविधा का होना चाहिये.

निकट भविष्य के बारे में विंट का कहना था कि आइपी6 को लागू करना पहली प्राथमिकता है क्योंकि 2010 तक आइपी4 के पते ख़त्म हो जाएँगे. इसके अलावा उन्होंने बताया कि 2008 में अन्य लिपियों में डोमेन नाम भी पूरी तरह काम करना शुरू कर देंगे.

बॉब ने डारपा (अमेरिकी रक्षा मंत्रालय की संस्था, जहाँ इंटरनेट का आविष्कार हुआ) छोड़ने के बाद एक नॉन-प्रॉफ़िट संस्था सीएनआरआइ शुरू की और अब उसके अध्यक्ष व सीईओ हैं. विंट इन दिनों गूगल के उपाध्यक्ष और चीफ़ इंटरनेट इवैंजलिस्ट (प्रचारक) हैं. इसके अलावा 2000 के बाद से वे आइकैन बोर्ड के चेयरमैन भी हैं.

सेलफ़ोन से कुछ तस्वीरें ली थीं. बहुत अच्छी तो नहीं हैं पर पोस्ट करूँगा ये रहीं.

Friday, April 27, 2007

खड़ीबोली

अभय ने आज सुप्रसिद्ध हिंदी भाषाविज्ञानी किशोरीदास वाजपेयी की 'हिंदी शब्दानुशासन' से कुछ रोचक अंश प्रस्तुत किए हैं. हिंदी भाषाविज्ञान से संबंधित कुल नेट पर ही बहुत कम देखने को मिलता है, ब्लॉगों पर तो न के बराबर. पढ़कर मज़ा आया. उम्मीद है इस बहाने कुछ चर्चा भी होगी.

इन अंशों में खड़ीबोली के नामकरण पर पंडित वाजपेयी के विचार भी हैं. इस पर बात थोड़ी आगे बढ़ाई जाए, एक और भाषाविज्ञानी डॉ. भोलानाथ तिवारी के हवाले से.

खड़ीबोली नाम का प्रयोग दो अर्थों में होता है: एक मानक हिंदी के लिए, दूसरा दिल्ली-मेरठ के आसपास बोली जाने वाली बोली के लिए. क्योंकि यह क्षेत्र पुराना 'कुरू' जनपद है, इस दूसरे अर्थ के लिए 'कौरवी' का प्रयोग भी होता है. यह नाम इसे राहुल सांकृत्यायन ने दिया था. तिवारी कहते हैं कि अच्छा हो यदि मानक हिंदी को 'खड़ीबोली' कहा जाए और इस क्षेत्रीय बोली को 'कौरवी'.

बहरहाल, तिवारी के अनुसार खड़ीबोली के नाम के विषय में भाषाविदों में एकसम्मति नहीं है (इस बात का ज़िक्र वाजपेयी ने भी किया है) और निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि इसका यह नाम क्यों पड़ा.
अपनी पुस्तक "हिंदी भाषा" में वे लिखते हैं:

यह नाम कैसे पड़ा, विवाद का विषय है. मुख्य मत निम्नांकित हैं:

1) 'खड़ी' मूलतः 'खरी' है और इसका अर्थ है 'शुद्ध'. लोगों ने इसका साहित्य में प्रयोग करते समय जब अरबी-फ़ारसी शब्दों को निकालकर इसे शुद्ध रूप में प्रयुक्त करने का यत्न किया तो इसे 'खरीबोली' कहा गया जो बाद में 'खड़ीबोली' हो गया.

2) 'खड़ी' का अर्थ है जो 'खड़ी हो' अर्थात 'पड़ी' का उल्टा. पुरानी ब्रज, अवधि आदि 'पड़ी बोलियाँ' थीं, अर्थात आधुनिक काल की मानक भाषा नहीं बन सकीं. इसके विपरीत यह बोली आवश्यकता के अनुरूप खड़ी हो गई, अतः खड़ीबोली कहलाई. चटर्जी यही मानते थे.

3) कामताप्रसाद गुरू आदि के अनुसार 'खड़ी' का अर्थ है 'कर्कश'. यह बोली ब्रज की तुलना में कर्कश है, अतः यह नाम पड़ा.

4) ब्रज ओकारांतता प्रधान है, जबकि खड़ीबोली आकारांतता प्रधान. किशोरीदास वाजपेयी के अनुसार खड़ीबोली की आकारांतता की 'खड़ी पाई' ने ही इसे यह नाम दिया है.

5) बेली ने 'खड़ी' का अर्थ 'प्रचलित' या 'चलती' माना, अर्थात जो ब्रज आदि को पीछे छोड़ प्रचलित हो गई.

6) गिल्क्राइस्ट ने 'खड़ी' का अर्थ 'मानक' (Standard) या 'परिनिष्ठित' किया है.

7) अब्दुल हक़ 'खड़ी' का अर्थ 'गँवारू' मानते हैं.

इनमें कौन सा मत ठीक है, कौन सा नहीं ठीक है, सनिश्चय कहना मुश्किल है. यों पुराने प्रयोगों से पहले मत को समर्थन मिलता है.